२००० का प्रारम्भ अच्छा हुआ था, मैंने नए साल पर शुभ कामनाएं दीं, एक सिलसिला शुरू हो गया था जिसमें मैं किसी भी सूरत में कोई व्यवधान नहीं चाहता था, मैं कोई भी ऐसा मौका नहीं चूकता जिसमें मैं उससे बात कर पाऊँ। इस वर्ष मैंने मोटर साइकिल ले ली थी और इसी से एक चक्कर लगा दिया, हालाँकि ३०० किमी चलाना थोड़ा अव्यावहारिक था, लेकिन अपनी सुविधा को देखते हुए यह एक अच्छा विकल्प था। एक आशा यह भी थी कि यदि मोटर साइकिल होगी तो संभवत: मोटर साइकिल पर उसे बैठाने का सुअवसर मिलेगा, और ऐसा हुआ भी। वह भी मेरी जिद के कारण। इसी मध्य एक परीक्षा का आयोजन दूसरे शहर में हुआ था जिसमें उसे शामिल होना था, सौभाग्य से मुझे भी वहां जाने का मौका मिल गया या कहिये कि मैंने निकाल लिया। परीक्षा के बाद मैं एक सुप्रसिद्ध जगह पहुँच गया और उसे भी बुला लिया, वहां लगभग एक घंटा ठहरे और आने वाले भविष्य की बातें करते रहे. उसके बाद फिर वहां से अपनी-अपनी राह ली. इसी प्रकार मैं जब भी मौका लगता, वहां पहुँच जाता. एक दिन जब घर पर शादी के बारे में बहुत जोर डाला गया तो फिर मैंने भी यह फैसला किया कि अब मैं उससे शादी करने के बारे में कहूँगा. मैं एक बार फिर जा पहुँचा, बात की तो उसने फिर वाही जबाव दिया कि बहनों की शादी के बाद. उसकी बहनों की शादी की चिंता इस दुनिया के किसी भी अन्य व्यक्ति से अधिक मुझे होने लगी थी. मैंने एक दिन उससे कहा कि मैं उसके घर बात करना चाहता हूँ. एक दिन बाद उसने मुझसे कहा कि ठीक है बात कर लो, लेकिन पहली बात तो यह है कि अगर तुम आइ०ए०एस० भी होते तब भी शायद ही इसे माना जाता, लेकिन पापा जो भी कहें तुम हाँ करते जाना. मैंने फोन किया, फोन करते समय मेरा दिल बड़ी तेजी से धड़क रहा था, माथे पर पसीना आ गया और हाथ काँपने लगे. उसके पिता जी से बात की और जैसा कि अंदेशा था उन्होंने कहा कि मुझे वहां ट्रान्सफर कराना पड़ेगा, मैंने कहा कुबूल, उन्होंने कहा कि तुम्हें कन्वर्ट होना पड़ेगा, मैंने उसकी सलाह के अनुसार कहा कुबूल. अगले दिन मैंने उससे बात की उसने बताया कि पापा को दिल की बीमारी है और कल की बात के बाद उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया है. और अब सब कुछ ख़त्म. मैं एक बार पुन: वापस आ गया. लेकिन कोशिशें जारी थीं. मेरे साथ के कुछ लोग मुझे नशेडी कहने लगे, कुछ मजाक बनने लगे. मैं एकाकी हो चला था, सूरत एक ही मन में बसी थी. अंततोगत्वा, छब्बीस फरवरी, २००२ को मैंने निराश होकर वह कदम उठाया जो शायद मेरे लिए बड़ा ही एक्सट्रीम डिसीजन था. मैंने तकरीबन साठ या पैंसठ nitragepam लीं और उन्हें एक - एक कर निगल गया. मैंने अपनी माँ से कहा कि मैं सोना चाहता हूँ, मुझे उठायें ना, फोन का रिसीवर हटा कर रख दिया .माँ ने कुछ घंटों बाद आवाज दी होगी जब कोई उत्तर नहीं मिला तो फिर मेरे एक साथी को फोन किया, वह घर आए, मुझे निकाला होगा और फिर आज मैं जिन्दा हूँ, अपनी माँ और उन साथियों के कारण. ईश्वर की कृपा यह हुई कि मेरे वृद्ध पिता मेरी अर्थी उठाने से बच गए. याद अभी भी आती है लेकिन वह जाते जाते सबकुछ ले गई. उसके जाने के बाद मैं बुरी तरह टूट गया. लाख कोशिशों के बाद भी मैं अपने अन्दर के उस खुशमिजाज आदमी को वापस नहीं ला पाया हूँ जिसे हर समय गाना सुनना अच्छा लगता था, जो खेल-कूद में मस्त रहता था, जो चाय पीते हुए उपन्यासों में खो जाता था, जो मोटर साइकिल उठाकर कभी भी कहीं भी चलने को तैयार रहता था, जो कभी भी अपना कैमरा उठाकर क्लिक करने को तैयार रहता था. खैर जिंदगी तो काटनी ही है - तेरा बिना जिंदगी भी जिंदगी नहीं. यह बताना तो भूल ही गया कि इस प्रकरण के बाद एक बार मैंने फिर फोन किया उसने कहा - सॉरी , मैंने कहा "अब तो सब कुछ ख़त्म हो ही चुका है. लेकिन मैं तुम्हें कम से कम इस जिंदगी में भूल तो नहीं पाऊँगा।"
मैं अभी भी यह जानना चाहता हूँ कि उसने ऐसा क्यों किया। हो सकता है कि कभी वह यह ब्लॉग पढ़ ले और शायद मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर मिल जाए.






