Saturday, August 23, 2008

पीर जो दबाये न रह सका - 6

२००० का प्रारम्भ अच्छा हुआ था, मैंने नए साल पर शुभ कामनाएं दीं, एक सिलसिला शुरू हो गया था जिसमें मैं किसी भी सूरत में कोई व्यवधान नहीं चाहता था, मैं कोई भी ऐसा मौका नहीं चूकता जिसमें मैं उससे बात कर पाऊँ। इस वर्ष मैंने मोटर साइकिल ले ली थी और इसी से एक चक्कर लगा दिया, हालाँकि ३०० किमी चलाना थोड़ा अव्यावहारिक था, लेकिन अपनी सुविधा को देखते हुए यह एक अच्छा विकल्प था। एक आशा यह भी थी कि यदि मोटर साइकिल होगी तो संभवत: मोटर साइकिल पर उसे बैठाने का सुअवसर मिलेगा, और ऐसा हुआ भी। वह भी मेरी जिद के कारण। इसी मध्य एक परीक्षा का आयोजन दूसरे शहर में हुआ था जिसमें उसे शामिल होना था, सौभाग्य से मुझे भी वहां जाने का मौका मिल गया या कहिये कि मैंने निकाल लिया। परीक्षा के बाद मैं एक सुप्रसिद्ध जगह पहुँच गया और उसे भी बुला लिया, वहां लगभग एक घंटा ठहरे और आने वाले भविष्य की बातें करते रहे. उसके बाद फिर वहां से अपनी-अपनी राह ली. इसी प्रकार मैं जब भी मौका लगता, वहां पहुँच जाता. एक दिन जब घर पर शादी के बारे में बहुत जोर डाला गया तो फिर मैंने भी यह फैसला किया कि अब मैं उससे शादी करने के बारे में कहूँगा. मैं एक बार फिर जा पहुँचा, बात की तो उसने फिर वाही जबाव दिया कि बहनों की शादी के बाद. उसकी बहनों की शादी की चिंता इस दुनिया के किसी भी अन्य व्यक्ति से अधिक मुझे होने लगी थी. मैंने एक दिन उससे कहा कि मैं उसके घर बात करना चाहता हूँ. एक दिन बाद उसने मुझसे कहा कि ठीक है बात कर लो, लेकिन पहली बात तो यह है कि अगर तुम आइ०ए०एस० भी होते तब भी शायद ही इसे माना जाता, लेकिन पापा जो भी कहें तुम हाँ करते जाना. मैंने फोन किया, फोन करते समय मेरा दिल बड़ी तेजी से धड़क रहा था, माथे पर पसीना आ गया और हाथ काँपने लगे. उसके पिता जी से बात की और जैसा कि अंदेशा था उन्होंने कहा कि मुझे वहां ट्रान्सफर कराना पड़ेगा, मैंने कहा कुबूल, उन्होंने कहा कि तुम्हें कन्वर्ट होना पड़ेगा, मैंने उसकी सलाह के अनुसार कहा कुबूल. अगले दिन मैंने उससे बात की उसने बताया कि पापा को दिल की बीमारी है और कल की बात के बाद उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया है. और अब सब कुछ ख़त्म. मैं एक बार पुन: वापस आ गया. लेकिन कोशिशें जारी थीं. मेरे साथ के कुछ लोग मुझे नशेडी कहने लगे, कुछ मजाक बनने लगे. मैं एकाकी हो चला था, सूरत एक ही मन में बसी थी. अंततोगत्वा, छब्बीस फरवरी, २००२ को मैंने निराश होकर वह कदम उठाया जो शायद मेरे लिए बड़ा ही एक्सट्रीम डिसीजन था. मैंने तकरीबन साठ या पैंसठ nitragepam लीं और उन्हें एक - एक कर निगल गया. मैंने अपनी माँ से कहा कि मैं सोना चाहता हूँ, मुझे उठायें ना, फोन का रिसीवर हटा कर रख दिया .माँ ने कुछ घंटों बाद आवाज दी होगी जब कोई उत्तर नहीं मिला तो फिर मेरे एक साथी को फोन किया, वह घर आए, मुझे निकाला होगा और फिर आज मैं जिन्दा हूँ, अपनी माँ और उन साथियों के कारण. ईश्वर की कृपा यह हुई कि मेरे वृद्ध पिता मेरी अर्थी उठाने से बच गए. याद अभी भी आती है लेकिन वह जाते जाते सबकुछ ले गई. उसके जाने के बाद मैं बुरी तरह टूट गया. लाख कोशिशों के बाद भी मैं अपने अन्दर के उस खुशमिजाज आदमी को वापस नहीं ला पाया हूँ जिसे हर समय गाना सुनना अच्छा लगता था, जो खेल-कूद में मस्त रहता था, जो चाय पीते हुए उपन्यासों में खो जाता था, जो मोटर साइकिल उठाकर कभी भी कहीं भी चलने को तैयार रहता था, जो कभी भी अपना कैमरा उठाकर क्लिक करने को तैयार रहता था. खैर जिंदगी तो काटनी ही है - तेरा बिना जिंदगी भी जिंदगी नहीं. यह बताना तो भूल ही गया कि इस प्रकरण के बाद एक बार मैंने फिर फोन किया उसने कहा - सॉरी , मैंने कहा "अब तो सब कुछ ख़त्म हो ही चुका है. लेकिन मैं तुम्हें कम से कम इस जिंदगी में भूल तो नहीं पाऊँगा।"

मैं अभी भी यह जानना चाहता हूँ कि उसने ऐसा क्यों किया। हो सकता है कि कभी वह यह ब्लॉग पढ़ ले और शायद मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर मिल जाए.

Friday, August 15, 2008

नेताजी को घाटा

शाम को टहलते हुए मिले नेताजी जुगाड़ दास,

मूड था बिगड़ा हुआ, लग रहे थे उदास।

कुछ करीब आए,

हम यूँही मुस्कुराये.

फिर दागा एक सवाल,

क्या हुआ नेताजी, क्यों बिगड़ा हुआ है हाल।

हमें भी कुछ बताइये.

बताने से गम हल्का होता है, बताकर गम को दूर भगाइए।

नेताजी ने दिल को कडा किया.

अपने जख्मों को हरा किया।

मुंह को खोला

और कुछ इस तरह बोला।

क्या बताएं भ्राता।

हमें तो हो गया ढाई करोड़ का घाटा।

हम रह गए सन्न, नेताजी का कोई नहीं था व्यापार।

दुनियावी चीजों से नहीं था उन्हें कोई सरोकार।

हमने फिर दुस्साहस किया।

सवाल पर सवाल दाग दिया।

कैसे यह सब हो गया हमें भी बताइए?

अपने गम में हमें भी भागीदार बनाइये।

उन्होंने दिया प्रतिउत्तर.

सुन मेरे पुत्तर,

पचास लाख में मिल रहा था टिकट।

कुछ हो गई थी समस्या विकट।

जिस कारण अरेंज नहीं कर पाया था मनी.

और टिकट पा गया था रामधनी।

अरे टिकट पा गया होता

तो पिछले दिनों तीन करोड़ पाता।

पचास निकाल कर ढाई करोड़ फिर भी बच जाता.

श्री सुरेश कुमार जैन का दोष

श्री सुरेश कुमार जैन, आई ० जी ० का क्या दोष था कि उनका नाम राष्ट्रपति के पदक से सम्मानित किए जाने वाले अधिकारियों की सूची से निकाल दिया गया। क्या आज तक पूरे देश में गोली चलाने का आदेश देने वाले किसी भी अधिकारी को सम्मानित नहीं किया गया, क्या तमाम के तमाम ऐसे अधिकारियों को तुंरत ही स्थानांतरित कर दिया गया? क्या इसलिए उन्हें वापस दिल्ली बुला लिया गया कि एक पुलिस अधिकारी होने के नाते उपद्रवियों पर गोली चलाने के आदेश दे दिए, यदि ऐसा ही है तो बाकी जम्मू और पूरे देश के अधिकारियों के साथ ऐसा सुलूक क्यों नहीं किया जाता। इससे यह स्पष्ट होता है कि छुद्र स्वार्थों की पूर्ति हेतु राजनीति से जुड़े हुए लोग कैसा भी निर्णय ले सकते हैं, चाहे फिर उनके निर्णयों में घोर साम्प्रदायिकता ही क्यों न व्याप्त हो ? इस प्रकार के निर्णय आगे चलकर अधिकारियों को कम से कम एक विशेष संप्रदाय से सम्बंधित अपराधियों के प्रति भी कार्यवाई करने को लेकर मात्र हतोत्साहित ही करेंगे और इससे जो संदेश जायेगा वह समाज को किस तरफ ले जायेगा, लोगों की मानसिकता में क्या अन्तर आएगा, इसका जबाव भी आने वाले वर्षों में स्वत: मिल जायेगा। विशेष संप्रदाय को खुश करने की कोशिशों की ही अगली और ugly कड़ी है यह निर्णय।

Thursday, August 14, 2008

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष - इन पाँचों चित्रों को एक-एक कर पढ़ें व अपने विचार अवश्य रखें.






स्थानीय मान-2

एक अधिकारी अपने कार्यालय के एक आयोजन में - "देखिये अगर देश को आगे बढ़ाना है तो हम लोगों को अपने निहित स्वार्थों को छोड़ना पड़ेगा, देश हित में अपने हितों का त्याग करना पड़ेगा। और यह हम सब लोगों का पुनीत कर्तव्य है कि देश हित में अपने छुद्र हितों को आड़े न आने दें, अपने कामों को पूरी ईमानदारी से करें और पूरी तरह से ईमानदार बनें, भ्रष्टाचार हमारे देश को कैंसर की तरह अन्दर से चाट रहा है।" बोलते बोलते उनका गला भर गया, सामने रखा पानी का गिलास उन्होंने उठाकर मुंह से लगा लिया।
वही महोदय अपने अधीनस्थ से - "अरे भई देखो मेरे घर में जो इनवर्टर लगा है उसकी बैटरी ख़राब हो गई है, नई लगवा देना। और ऐसा करना कि दो किलो मिठाई ले आना बच्चों के लिए। बाकी अभी जो परचेज करनी है, उसमें से इसे एडजस्ट कर बाकी का पेमेंट कर देना."

Sunday, August 10, 2008

स्थानीय मान

एक कार्यालय का पहला दृश्य - "क्या बात है श्याम लाल, बड़े नाराज लग रहे हो, क्या हो गया?" श्याम लाल के साथ काम करने वाले कर्मचारी ने पूछा. "क्या बताऊं, कैसा जमाना आ गया है, बच्चे के एडमिशन के लिए भी घूस देनी पड़ती है, अरे भाई, ये डोनेशन भी तो एक तरह की घूस ही तो है!"श्याम लाल ने अपने सहयोगी की तरफ़ देखते हुए जवाब दिया। उसी कार्यालय में कुछ देर बाद दूसरा दृश्य-"अरे भाई, जाओ यहाँ से, कह तो दिया पाँच हजार से कम में काम नहीं होगा। कराना है तो पाँच हजार लेकर आना, समझ गए." श्याम लाल अपने सामने खड़े व्यक्ति से कह रहे थे.

धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को सीमित किया जाए .

धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर विभिन्न धर्मों के अनुयायी अपनी शक्ति प्रदर्शित करते हैं और फिर उसका लाभ चुनावों में या फिर अपनी मांगें मनवाने के लिए करते हैं. इसलिए क्या यह अधिक अच्छा नहीं रहेगा कि धार्मिक स्वतंत्रता को घरों तक सीमित कर दिया जाए, सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक आयोजन बंद किए जाएँ व लाउड़ स्पीकर तथा सड़कों/घरों पर भीड़ जमाकर धार्मिक आयोजनों पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाए??

Saturday, August 9, 2008

धर्म निरपेक्षता का पाखण्ड

कितने धर्मनिरपेक्ष हैं हमारे नेता इसका अंदाजा कुछ नीचे लिखे तथ्यों से हो जाएगा :- १। आज तक जम्मू कश्मीर के लिए अलग से क़ानून बनाये जाते हैं, प्रत्येक एक्ट में लिखा होता है, पूरे भारत में लागू जम्मू कश्मीर को छोड़ कर. २-मुस्लिम समुदाय के लिए विशेष रूप से उनका पर्सनल क़ानून लागू होता है बाकी बहुसंख्यकों के लिए उनके अपने धर्म से सम्बंधित कानूनों की जगह देश की सामान्य संहिता लागू होती है. ३-चुनावों में स्पष्ट देखा जा सकता है कि टिकट जाति और धर्म के अनुसार अधिक संख्या वाली बिरादरी के व्यक्ति को दिया जाता है. ५-जम्मू कश्मीर में लाखों हिन्दुओं को अपना घर-परिवार छोड़कर अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह रहना पड़ा, उनकी सुधि आज तक किसी धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति ने नहीं ली, केवल जबानी जमा-खर्च ही किया जाता रहा. ६-देश में हज हाउस बनने पर कहीं कोई आपत्ति नहीं होती लेकिन अमरनाथ यात्रा हेतु थोडी जमीन लीज़ पर देने पर इतना बड़ा बवाल, गोया कि विदेशियों को जमीन दे दी गई हो. ६- शाहबानो को गुजारा भत्ता देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संविधान में संशोधन किया गया. ७-जम्मू कश्मीर में दो विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई जिनका मुख्य कर्ता-धर्ता राज्य का मुख्यमंत्री होगा, लेकिन यदि गलती से मुख्यमंत्री कोई हिन्दू बन गया तो इनका प्रधान कोई मुस्लिम होगा. ८-मुस्लिमों की आर्थिक स्थिति के लिए सच्चर आयोग की स्थापना की गई जैसे कि और किसी धर्म में गरीब होते ही नही. यहाँ यह लिखना उचित होगा कि मुस्लिमों में स्वरोजगार करने वालों की दर अन्य किसी भी धर्म वालों से ज्यादा है. ९-आतंकवाद विरोधी कानून बनाने को लेकर यूँ दर्शाया गया जैसे कि सारे मुस्लिमों को जेल में डाल दिया जायेगा, एक कारण यह भी गिनाया जाता है कि पोटा होने के बाद भी संसद पर हमला हुआ, लेकिन सेना के रहते भी भारत पर कई बार युद्ध थोपा गया इसलिए क्या सेना को ख़त्म कर दिया जाए?१०-मन्दिर में जाना पाखंड, साम्प्रदायिकता और मजारों पर जाना धर्मनिरपेक्षता!११.धार्मिक आधार पर आरक्षण.१२-कुतर्कों द्वारा सिमी जैसी संस्थाओं का समर्थन। १३.तसलीमा नसरीन के लिखने पर उनके ऊपर ईनाम, उनको भारत से देश निकाला, लेकिन मकबूल फिदा हुसैन द्वारा बनाये गए चित्र उनकी कला कहकर प्रोत्साहन.१४.आतंकवादियों के सर पर एक लाख ईनाम रखने पर क़ानून व्यवस्था को खतरा कहकर मुक़दमा कायम कराना, वहीं डेनमार्क के कार्टूनिस्ट पर करोड़ों रुपये के ईनाम रखने वाले पर कोई कारवाई नही. १५. कश्मीर के लोगों द्वारा आन्दोलन करने पर कुछ दिनों के अन्दर ही जमीन लौटा दी गई, लेकिन जम्मू के लोगों द्वारा महीने भर से ज्यादा आन्दोलन करने के बाद ही एक समिति बनाई गई.शायद ये लोग इतनी मामूली समझ भी नहीं रखते कि किसी भी बच्चे को माँ-बाप चुनने का अधिकार नहीं होता, उसका वही धर्म-जाति हो जाता है जो उसके माँ-बाप का होता है, यदि इतनी सी समझ हम लोगों में आ जाए तो शायद यह जाति धर्म के झगडे स्वत: ही बंद हो जायेंगे. और शायद इनकी दुकाने भी.

Tuesday, August 5, 2008

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष



आलेख को ऊपर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है।


Saturday, July 26, 2008

आतंकियों का स्वागत

आओ वीर आतंकियो आओ तुम्हारा स्वागत है
इस धर्मनिरपेक्ष मुल्क में हम तैयार हैं तुम्हारे स्वागत को
हमारे बच्चे भी, आओ तुम बम लगाओ
हमारी जडें बहुत मजबूत हैं हिलेंगी नहीं
तब भी, जब हमारा अस्तित्व खत्म हो जायेगा
तब भी, कौमी तराने गूंजते रहेंगे
चाहे उन्हें सुनने वाला कोई न हो
तुम हमारी पीढियों को तबाह कर सकते हो
क्योंकि तुम अल्प हो
हम अपने बच्चों को आगे करते रहेंगे
तुम उनके सीने चाक करते रहना
क्योंकि तुम अल्प हो
और जो चीज बढ जाती है
उसे खत्म होना ही होता है
इसलिये तुम बम लगाओ
हम तुम्हें सजा नहीं देंगे, खीर देंगे
खीर खाओ और इन्तजार करो
कि कब एक आई सी ८१४ उडे
और कब तुम्हें शाही मेहमान की तरह छोडा जाये
तुम हमारे उन बच्चों के सीने गोलियों से छलनी कर दो
जिन्हें हमने प्यार से पाला था
बडे अरमानों से पोसा था
तुम बम लगा सकते हो
हम कोई कार्रवाई नहीं करेंगे
क्योंकि हम वास्तविक धर्म निरपेक्ष हैं
हम इतिहास से भी सबक नहीं लेंगे
क्योंकि हम बहुल हैं, हम निरपेक्ष हैं
आओ तुम स्वतन्त्र हो
कहीं भी बम लगाओ
ट्रेन में, पार्क में, पूजा स्थलों में, अदालतों में
लेकिन हम फिर भी चुप रहेंगे
तुम हमें सिरे से खत्म कर सकते हो
हमारी पीढियों को फना कर सकते हो
तुम कुछ भी कर सकते हो
लेकिन हम यूं ही रहेंगे
क्योंकि आत्मा अमर है
और हमें अमरत्व से प्रेम है
इसलिये हे वीर आतंकियो
हमें अमरत्व प्रदान करो
और फिर अगर सौ पचास रोज भी मर जायें तो क्या है
काफी तो फिर भी बाकी रहेंगे ही
और फिर उनके जाने से कुछ तो भला होगा
जिन्दा रहे तो क्या कर पाये
मरकर एक लाख तो पाये
और फिर सौ पचास वोट ही तो कम हुये
पता नहीं उनमें से कितने सत्तों को मिलते
कितने विरोधियों को
क्या पता इनमें कुछ साम्प्रदायिक भी होते
और कडी निन्दा कर तो दी है
सद्भाव बनाने की अपील भी कर दी है
फिर मौत को एक दिन तो आना ही था
शायद तुम्हारे बमों पर ही उनका नाम लिखा था
विधाता को भी यही स्वीकार था
इसलिये क्या फायदा मरे हुओं को रोने का
अपना चेहरा आंसुओं से भिगोने का
और उनमें कौन देश की धडकन था
कौन युवा ह्रदय सम्राट था
किस का बाप सांसद या मन्त्री था
एक का बाप तो सेना में सन्त्री था
एक अनाथ था
एक के घर में तीन ही वोट
थे इनके मरने से कौन सा पहाड टूट गया
कौन सा समझौता टूट गया
लोग तो मरते ही हैं, कुछ बीमारी से
कुछ जरूरत से ज्यादा तीमारदारी से
बेकारी से, बेरोजगारी से सर्दी से, गरमी से, बाढ से, सूखे से
अकाल से, भूखे से
इनको लेकर क्या रोना
क्यों अपने नयन खोना
यह दुनिया है ही एक माया-भ्रम
इसलिये क्यों कुछ करें हम
बेकार ही में साम्प्रदायिक सद्भाव को ठेस पहुंचायें
हम बहुल हैं, उदारमना हैं, इसलिये सबकुछ चलेगा
हम क्यों अपने बी०पी० को बढाएं
बढाने को तो व्यापार है
जिसके लिये हम तैयार हैं
हम सब कुछ बेच सकते हैं
अपने आप को
अपने बाप को
आओ हमें खरीदो तुम्हारा स्वागत है
हमने बेच दिया है अपना आत्म सम्मान
अपना स्वाभिमान, अपना ईमान
अपना धर्म, अपनी नीति
हम बेचने से पहले खुद को तौलते हैं
फिर अपनी कीमत बोलते हैं
जिसमें खाते हैं उसी में छेद करते हैं
जिस पर बैठते हैं उसी को काटते हैं
हम गलतियां दोहराते ही नहीं उन्हें बहुगुणित कर डालते हैं
तुम्हें ऐसे लोग और कहां मिलेंगे
इसलिये आओ तुम्हारा स्वागत है।

By S